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भले हैं जनता के नौकर, पर मिजाज मालिकों से कम नहीं!, सरकारी दफ्तर के ज्यादातर लोकसेवक आम लोगों का कॉल रिसीव करने नहीं उठाते जहमत…

हरि अग्रवाल@जांजगीर-चांपा। अक्सर आप किसी सरकारी कार्यालय में कोई काम लेके जाते होंगे और वहां आपकी कार्यालय प्रमुख से मुलाकात नहीं होती। ऐसी स्थिति में आप वहां के कर्मचारियों से संपर्क कर अपना काम निपटाने की कोशिश करते होंगे, लेकिन कर्मचारियों से महज तारीख ही मिल पाता है। काम ज्यादा जरूरी होने पर कार्यालय प्रमुख को ही कॉल करना पड़ता है, लेकिन अफसर अंजान कॉल रिसीव करने की जहमत तक नहीं उठाते। एक-दो नहीं, बल्कि ज्यादातर सरकारी दफ्तरों का यही हाल है, जहां के अफसर किसी आम आदमी का कॉल रिसीव करना अपने शान के खिलाफ समझता है।

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ये अफसर भूल जाते हैं कि जिनका वो कॉल रिसीव नहीं कर रहे हैं वो और कोई नहीं, बल्कि वहीं उनके मालिक है, जिनकी नौकरी वो कर रहे हैं। उन्हीं के पैसों से लोकसेवकों के घर का चूल्हा जलता है। इनकी नियुक्ति भी जनता से जुड़ें कार्यों को प्राथमिकता के साथ करने के लिए हुई है, लेकिन अफसर कुर्सी पाते ही मालिक बन जाता है और जनता पर ही अपनी मनमानी थोपने लगता है। यही वजह है कि अनजान कॉल रिसीव करना मुनासिब नहीं समझते। हमारे इर्द-गिर्द भी बहुत सारे सरकारी दफ्तर ऐसे हैं, जहां के अफसर कोई आम लोगों का फोन रिसीव करते ही नहीं है। उसकी देखा देखी संबंधित कार्यालय के कर्मचारी भी कॉल रिसीव नहीं करते। कई अफसर तो यहां तक कह डालते हैं कि वो उनका पर्सनल नंबर है, उनकी मर्जी किसी का फोन उठाए या न उठाएं। ऐसे अफसरों के लिए यही जवाब उचित होगा, कि वो जिम्मेदार अफसर है और यदि वो पर्सनल नंबर है तो फिर उसे सार्वजनिक क्यों किया गया है। इसके अलावा फिर सार्वजनिक नंबर कौन सा है, जिसमें कॉल कर आम लोग भी अपनी समस्या बता सकें और समय की बचत करते हुए फोन पर ही समस्या का निदान हो सके। भले ही राज्य सरकार ने लोकसेवकों के लिए टाइम टेबल तय किया है, लेकिन इसका पालन महज कुछ दफ्तरों में ही हो रहा है। कई अफसर तो ऐसे हैं जहां बाहर से आना-जाना कर रहे हैं। हम उंगली में गिन सकते हैं,, कई अफसर ऐसे हैं, जिनका कार्यालय में मन ही नहीं लगता। वो ज्यादातर अपने सरकारी क्वार्टर से ही काम निपटाते हैं। ऐसे अफसरों को ये याद रखना चाहिए कि कई जरूरतमंद आम लोगों की गुहार सुनकर उनकी समस्या का हल निकालने का दायित्व भी उनका है,, चाहे फोन के माध्यम से हो या फिर प्रत्यक्ष।

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दफ्तरों से अक्सर नदारद
जिले के कई सरकारी दफ्तर ऐसे हैं, जहां के अफसरों का दर्शन ही दुर्लभ है। भले ही सरकार ने सरकारी दफ्तरों में आने और जाने का समय तय किया है, लेकिन इसका पालन ज्यादातर लोग नहीं कर रहे हैं। जब लोग किसी काम से संबंधित कार्यालय पहुंचते हैं तो अफसर से मुलाकात ही नहीं हो पाती। यहां तक मोबाइल में संपर्क करने पर भी कॉल रिसीव नहीं करते। भले एक बार कॉल करो या फिर बार-बार। ऐसे लापरवाह अफसरों से जनता क्या उम्मीद कर सकती है।

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