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खेत की मेड़ से विधानसभा तक: विधायक ब्यास कश्यप की सादगी बनी पहचान …

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जांजगीर-चांपा। राजनीति में जहां अधिकांश नेताओं की पहचान बड़े मंच, भाषण और काफिलों से होती है, वहीं जांजगीर-चांपा विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक ब्यास कश्यप की पहचान इससे बिल्कुल अलग है। वे केवल जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि आज भी मिट्टी से जुड़े एक साधारण किसान के रूप में अपनी जीवनशैली जी रहे हैं।

विधायक बनने के बाद भी उनकी सादगी और खेती-किसानी से जुड़ाव में कोई बदलाव नहीं आया है। नैला स्थित अपने निवास पर रहने के दौरान वे प्रतिदिन सुबह खेत पहुंचते हैं। फसलों की स्थिति देखना, मजदूरों के साथ खड़े होकर खेती के कार्यों में हाथ बंटाना और खेती की बारीकियों पर चर्चा करना उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा है।
चाहे खेत की जुताई हो, धान की बुवाई, रोपाई या कटाई—हर कार्य में ब्यास कश्यप पूरी सहजता के साथ नजर आते हैं। यही वजह है कि क्षेत्र के लोग उन्हें केवल विधायक नहीं, बल्कि “अपनों के बीच का किसान” मानते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि आज के दौर में जब अधिकांश नेता आमजन से दूर होते जा रहे हैं, ऐसे समय में विधायक का खेतों में सक्रिय रहना लोगों के लिए प्रेरणा है।
किसानों की समस्याओं को वे केवल सुनते ही नहीं, बल्कि स्वयं महसूस करते हैं, क्योंकि खेती उनके जीवन का हिस्सा है। राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद खेती के लिए समय निकालना उनकी कार्यशैली को अलग पहचान देता है। सुबह खेतों में मेहनत करने के बाद वे आमजनों से मुलाकात, क्षेत्रीय कार्यक्रमों और छत्तीसगढ़ विधानसभा की बैठकों में भी पूरी सक्रियता से भाग लेते हैं।

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विधानसभा में भी वे क्षेत्र की समस्याओं और किसानों के मुद्दों को मुखरता से उठाने के लिए जाने जाते हैं। क्षेत्र में उनकी छवि एक ऐसे जनप्रतिनिधि की है, जो जमीन से जुड़ा हुआ है और जिसने राजनीति में आने के बाद भी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। गांवों में लोग अक्सर कहते हैं—“जो नेता खेत की मिट्टी समझता है, वही किसानों का दर्द सही मायनों में समझ सकता है।”
ब्यास कश्यप की यही सादगी, कर्मठता और जमीनी जुड़ाव उन्हें आम नेताओं से अलग बनाता है। खेतों में काम करते हुए उनकी तस्वीरें लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती हैं और यह संदेश देती हैं कि मेहनत और सादगी ही असली नेतृत्व की पहचान होती है।

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