


जांजगीर-चांपा। धान खरीदी में बड़े पैमाने पर हुए गबन मामले में न्यायालय से आरोपी को कोई राहत नहीं मिली है। बिर्रा धान खरीदी केंद्र में 42 लाख रुपए से अधिक के गबन और साक्ष्य मिटाने के आरोप में फंसे कम्प्यूटर ऑपरेटर दीपक देवांगन की अग्रिम जमानत याचिका को प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश जांजगीर ने खारिज कर दिया है।


थाना बिर्रा में दर्ज अपराध क्रमांक 70/2026 के तहत आरोपी दीपक देवांगन (44 वर्ष), निवासी ग्राम भाठापारा, बिर्रा के विरुद्ध धारा 316(5), 61(2) एवं 238 भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत मामला दर्ज है। आरोपी ने अग्रिम जमानत के लिए न्यायालय में याचिका दायर की थी।अपनी याचिका में दीपक देवांगन ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहा कि वह सेवा सहकारी समिति बिर्रा में संविदा पर कम्प्यूटर ऑपरेटर है। उसका कार्य केवल प्रबंधक द्वारा दिए गए आंकड़ों को कम्प्यूटर में दर्ज करना था। उसने किसी शासकीय दस्तावेज से छेड़छाड़ नहीं की और न ही किसी राशि का दुरुपयोग किया। उसने यह भी तर्क दिया कि मुख्य अभियुक्त संस्था प्रबंधक नरेंद्र सिंह ठाकुर ने स्वयं धान खरीदी में कमी की जिम्मेदारी ली है। साथ ही उसका कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है।

केस डायरी में खुलासा: डाटा डिलीट कर साक्ष्य मिटाने का आरोप – हालांकि, अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत केस डायरी में गंभीर तथ्य सामने आए हैं। प्रकरण के प्रार्थी लीलाधर सिंह कंवर, शाखा प्रबंधक, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक बिर्रा ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि वर्ष 2025-26 के दौरान 1347.50 क्विंटल धान 2986 पुराने बारदाने सहित कुल 42,64,650.22 रुपए की आर्थिक क्षति हुई है। विवेचना के दौरान यह भी सामने आया कि आरोपी दीपक देवांगन ने कम्प्यूटर से डाटा डिलीट कर साक्ष्य मिटाने का प्रयास किया, जो उसकी संलिप्तता की ओर इशारा करता है।
न्यायालय ने माना कि आरोपी पर अन्य सह-अभियुक्तों के साथ मिलकर शासकीय धन के गबन का गंभीर आरोप है। यदि अग्रिम जमानत दी जाती है तो विवेचना प्रभावित हो सकती है, दस्तावेजों और राशि की जब्ती कठिन हो जाएगी तथा साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका बनी रहेगी। इन सभी तथ्यों को देखते हुए प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश शैलेन्द्र चौहान ने अग्रिम जमानत याचिका को निरस्त कर दिया। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी में सामने आए इस बड़े घोटाले ने प्रशासनिक कार्रवाई पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। 1 करोड़ 33 लाख रुपए के धान-बारदाना गबन मामले में तीन थानों में 7 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, लेकिन एफआईआर के 15 दिन बाद भी एक भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो पाई है।
आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं, जबकि पुलिस जांच के नाम पर हाथ-पांव मारती नजर आ रही है। गिरफ्तारी में हो रही देरी से आरोपियों को बचाव का पर्याप्त समय मिल रहा है, जिससे जांच की निष्पक्षता और प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है।





