



जांजगीर-चांपा। चांपा में क्रिकेट सट्टा अब एक मायाजाल बन चुका है।आईपीएल के अब तक 54 मुकाबले हो चुके हैं, लेकिन साइबर पुलिस और चांपा पुलिस कार्रवाई के नाम पर एक बोहनी तक नहीं कर पाई है। नतीजतन, सटोरिए बेखौफ होकर खुलेआम अपना नेटवर्क चला रहे हैं और आम लोग पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठा रहे हैं।


शहर और आसपास के इलाकों में सट्टा बाजार पूरी तरह सक्रिय है। चर्चा है कि सेटिंग्स के खेल में सिस्टम इस कदर उलझा हुआ है कि सटोरिए फल-फूल रहे हैं और कार्रवाई कहीं नजर नहीं आती। हालात ऐसे हैं कि लोग यह कहने लगे हैं— “खुला सट्टा, बंद कार्रवाई—पुलिस किसके साथ?”। सट्टा माफिया मजबूत, पुलिस कमजोर? चांपा में सवालों की बाढ़।



युवा पीढ़ी पर घातक असर – क्रिकेट सट्टे का सबसे खतरनाक असर युवा वर्ग, खासकर नाबालिगों पर देखने को मिल रहा है। लालच और आसान कमाई के सपने में युवा अपनी पढ़ाई, भविष्य और पारिवारिक शांति तक दांव पर लगा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, बीते एक सप्ताह में चांपा का एक नाबालिग युवक सट्टे में बड़ी रकम हार गया। डर के कारण उसने घर में किसी को कुछ नहीं बताया और अपनी मां के एटीएम कार्ड से पैसे निकालकर सटोरिए को चुका दिए। जब घर में मामला सामने आया तो पारिवारिक तनाव बढ़ा, युवक नाराज होकर घर से चला गया और कई घंटों तक मोबाइल बंद रहा। बाद में दोस्तों के समझाने पर वह लौटा। यह घटना आज के हालात की भयावह तस्वीर पेश करती है।
घर-परिवार भी बिखर रहे – परिवारों के सामने दोहरी मार है—बोलें तो रिश्ते टूटने का डर, न बोलें तो बच्चों का भविष्य बर्बाद। सट्टा न सिर्फ आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि घरों की शांति भी छीन रहा है।
कार्रवाई न होना सबसे बड़ा सवाल – सबसे चिंताजनक बात यह है कि नाबालिग आसानी से सटोरियों तक पहुंच रहे हैं, दांव लगा रहे हैं, लेकिन पुलिस उन तक नहीं पहुंच पा रही—या पहुंचना नहीं चाहती। खुलेआम चल रहे इस धंधे पर कार्रवाई न होना आमजन की समझ से परे है।
शहर में चर्चा है कि अगर सब कुछ इतना खुला है, फिर भी हाथ खाली क्यों हैं?
लोगों का आरोप है कि सेटिंग्स के कारण ही सट्टा बाजार बेखौफ चल रहा है और कार्रवाई कागजों तक सीमित है।
जनता की मांग
अब जरूरत है कि सट्टा नेटवर्क पर ईमानदार, पारदर्शी और सख्त कार्रवाई हो। वरना यह “मायाजाल” और गहराएगा, जिसमें युवा, परिवार और समाज—तीनों फंसते चले जाएंगे।







