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विरासत, तकनीक और वानिकी का संगम: दादा की प्रेरणा से लखुर्री के केशरवानी परिवार ने रचा नया कीर्तिमान …

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जांजगीर-चांपा/बम्हनीडीह/लखुर्री। लगभग 150 वर्ष पूर्व पूर्वज सिदार साव केशरवानी द्वारा रोपित आम का बगीचा आज केशरवानी परिवार की पहचान और क्षेत्र की एक अनमोल जैविक धरोहर बन चुका है। इस विरासत को आधुनिक तकनीक और नवाचार से जोड़ने में दादाजी श्री साधराम केशरवानी का मार्गदर्शन परिवार के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है।

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दादाजी की तकनीकी समझ और दूरदर्शिता का ही परिणाम था कि परिवार के श्री रामप्रकाश केशरवानी ने मात्र 15 वर्ष की आयु में 1940 मॉडल के ऐतिहासिक ट्रैक्टर को चलाना सीख लिया। बचपन से ही उन्हें पारंपरिक खेती के साथ-साथ कृषि यंत्रों की कार्यप्रणाली और उनके कुशल उपयोग का व्यावहारिक ज्ञान मिला, जिसका लाभ आज उनकी उन्नत कृषि पद्धतियों में स्पष्ट दिखाई देता है।
इसी सतत मार्गदर्शन और कठिन परिश्रम के चलते रामप्रकाश केशरवानी को प्रतिष्ठित डॉ. खूबचंद बघेल सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। दादाजी की प्रेरणा से आज केशरवानी परिवार आम की 100 से अधिक दुर्लभ किस्मों के संरक्षण, 10 हजार नीलगिरी और 20 हजार बांस के पौधों के रोपण के साथ-साथ गोपालन के क्षेत्र में भी प्रदेश के लिए मिसाल बना हुआ है।

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रामप्रकाश केशरवानी का कहना है कि कृषि, वानिकी और गोपालन के क्षेत्र में जो उपलब्धियां आज परिवार ने हासिल की हैं, वे सब दादाजी साधराम केशरवानी की सीख और संस्कारों का परिणाम हैं। यह बगीचा और उन्नत कृषि प्रक्षेत्र अब पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के समन्वय का जीवंत उदाहरण बन चुका है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा देता रहेगा।

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